जो महिलाए उनके लिए अप्राप्य थी जैसे कि रानी रूपमती, रानी जयवंती, रानी दुर्गावती तथा अन्य भी उन्हे बादशाहों की अतृप्त वासना की आग में जलना पड़ा। इस प्रकार के अनेक विवरण अबुल फजल से लेकर विन्सेंट स्मिथ द्वारा लिखे गये है।
शाहजहां अपनी हिन्दू घृणा, निर्दयता, लालच और वासना के लिए कुख्यात था। फ्रेंकोइस बर्नियर ने लिखा है कि उसके स्वयं अपनी पुत्री जहान आरा से योन संबंध थे तथा उसने उसके सभी प्रेमियों की हत्या करवा दी थी। इतना ही नहीं उसने कुलीन दो सुन्दर महिलाओं को अपने जाल में फंसाने के लिए जहान आरा का मध्यस्थ के रूप में उपयोग भी किया था। यह विदेशी यात्री निकोलो मानुकी द्वारा लिखा गया विवरण है। अकेले वाराणसी में छिहत्तर (76) मंदिरों को शाहजहां ने नष्ट करवा दिया था, हिन्दुओं पर ‘जजिया’ कर लगा कर वह विविध ढंग से उन्हे परेशान करता रहा। उसने ईसाइयों को भी बलपूर्वक मुसलमान बनाने का प्रयास किया तथा जिसने भी विरोध किया उसे हर ढंग से सताया गया। यह सब विवरण ‘बादशाह-नामा’ में लिखे गये है जिसे स्वयं शाहजहां ने लिखवाया था।
जहां तक औरंगजेब का प्रश्न है – उसने तो स्वयं अपने ही पिता को, अपने शिक्षकों को, अपने ही बडे तथा छोटे भाइयों को, अपनी ही बहन, अपनी ही संतानों (चाहे पुत्र हो या पुत्री) को निरंतर रूप से सताया था। इनमें से कुछ की तो उसने हत्या भी कर दी थी। जब वह अपने परिवार के सदस्यों के साथ ही ऐसा निर्दयतापूर्ण व्यवहार कर सकता था तो फिर अन्य के बारे में क्या कहे?
जदुनाथ सरकार द्वारा पांच खंडों में लिखित ‘हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब’ में औरंगजेब के हजारों अमानवीय अत्याचारों की जानकारी उपलब्ध है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि ऐसे दुष्ट अमानवीय अत्याचारी के कुछ पक्षधर आज भी हमारे देश में पाये जाते है। साहित्य, कला, संगीत तथा सभी सौन्दर्य कला विधाओं को नष्ट करने का वह उत्तरदायी रहा है। उसने व्यापार, व्यवसाय तथा कृषि क्षेत्र को भी हानि पहुंचाई। उसकी सेना सतत रूप से युद्ध लड़ती रही। उसका सैन्यबल तथा प्रशासन दक्षिण में पतनोन्मुख होता गया। उसने न केवल वाराणसी और मथुरा के मंदिरों को नष्ट किया किंतु उसने खुले तौर पर हिन्दुओं के विरुद्ध जिहाद का ऐलान भी कर दिया था और इन शहरों का विनाश किया था। उसने उदयपुर के एक सौ तेईस मंदिरों को धराशायी कर दिया, त्रैसठ मंदिर चित्तोड में और छांछट (66) मंदिर अंबर में नष्ट किये थे। इसे विन्सेन्ट स्मिथ ने लिखा है। भूखमरी और अकाल के समय में भी उसने हिंदुओं से ‘जजिया’ कर वसूला और निर्दयता पूर्वक अन्य कर भी लगाये। इतना ही नही उसने हिंदुओं के आजीविका के सभी साधन छीनते हुए या तो उन्हे मुसलमान बनने को बाध्य किया अन्यथा अत्याचार और मृत्यु का विकल्प चुनने को बाध्य किया। ऐसा भयानक विकल्प प्रस्तुत करनेवाला था यह अत्याचारी मुस्लिम शासक !! जब असहाय तथा उसके अत्याचारों को सहन करपाने में असमर्थ लोग उसके द्वार पर दया की याचना लेकर पहुंचे तो उसने उन पर हाथियों की सेना दौडा दी जिसमें हजारों निर्दोष लोग मारे गये। इस मुगल बादशाह की बर्बरता को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। यह सब विवरण औरंगजेब के समकालीन खफीखान ने ‘मुन्तखाव-उल लुबाब’ में विस्तार से लिखे हैं। ऐसे ही अनेक घटनाओं के विवरण हमें आठ खण्डों के एक महाग्रंथ ‘द हिस्ट्री ऑफ इंडिया एस टोल्ड बाय इट्स ओन हिस्टोरियंस’ में मिलते हैं। इस पुस्तक के महान लेखक द्वय एच. एम. ईलियट तथा जौन डाउसन ने अल बेरुनी से लगाकर जदुनाथ सरकार तक के अर्थात् शुरुआत से अब तक के सभी मुस्लिम अभिलेखों, इतिहासकारों आदि के लेखन को एक साथ प्रस्तुत करने का अति परिश्रम युक्त प्रयास किया है। इसी प्रकार आर. सी. मजूमदार तथा अन्य इतिहासकारों ने भी अनेक अभिलेखों के आधार पर मोहम्मद बिन कासिम के समय से औरंगजेब तक के लगभग एक हजार वर्षीय समय में भारत में किये गये मुस्लिम अत्याचारों का विवरण लिखा है। उन्होने एक सहस्त्राब्दी तक के इस इस्लामिक धार्मिक कट्टरवाद की कहानी लिखी है जो आज भी अनवरत रूप से चल रही है और इसके परिणामस्वरूप हिंसा, साम्राज्यवाद तथा राष्ट्रीय संस्कृति का विनाश चला आ रहा है। हिंदुओं पर इस्लामिक अत्याचारों की पाशविक हिंसा तुलनात्मक रूप से यहूदियों पर हिटलर के अत्याचारों से अति डरावनी है। यह शुद्ध रूप से हिन्दुओं का व्यापक स्तर पर नरसंहार था। सभ्य समाज में ऐसे अमानवीय, निर्दय और हिंसात्मक कृत्यों को वैश्विक स्तर पर भी निंदनीय घोषित किया जाना चाहिए।
इस्लाम की बर्बरता
‘द हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ द इंडियन पीपल’ के पांचवे खण्ड की प्रस्तावना में के.एम. मुंशी ने लिखा है –
सन् 1000 का वर्ष भारत के दुर्भाग्य का वर्ष था। उस वर्ष में पहली बार गजनी के महमूद ने भारत पर आक्रमण किया था। यह घटना प्राचीन भारत तथा मध्य कालीन भारत की विभाजन रेखा है। यद्यपि इसके पूर्व भी भारत पर आक्रमणों द्वारा विक्षोभ होता रहा जैसे कि सिकन्दर का आक्रमण, ब्रेक्ट्रियन ग्रीक लोगों की बाद, कुषाण, शक तथा हूणों के आक्रमण, सिंध पर अरब वासियों की घुसपैठ आदि। तथापि इन सभी घटनाओं का प्रभाव अस्थायी था तथा हमारी संस्कृति और सामाजिक संगठनात्मक संरचना की जीवंत धारा ने इन आक्रमणों के पश्चात बचे हुए विदेशी तत्त्वों को स्वयं में आसानी से समाहित कर लिया था। जीवंतता का यह सातत्य अद्भुत है। इसकी समुचित प्रशंसात्मक समझ के बिना आने वाले समय तक के भारतीय इतिहास के घटनाक्रम का सही अध्ययन कठिन है। इसे बनाये रखने वाले अनेक तत्त्व रहे है। इनमें से संभवतः सबसे महत्वपूर्ण ‘आर्यावर्त चेतना’ है जिसने ऊर्जा युक्त उत्साह और दृढ़ता की मान्यताओं तथा संस्थाओं का संचार किया था।
इस्लाम की बर्बरता के दुष्परिणामों पर के. एम. मुंशी लिखते है –
सुबुक्तगिन की मृत्यु के पश्चात उनके बेटे महमूद ने दुस्साहस से शीघ्र ही गजनी पर अपना अधिकार कर लिया जिसे उसके पिता ने अपने अन्य पुत्र के लिए छोड़ रखा था। वह उच्च कोटि का सेनापति था तथा अद्वितीय व्यक्तित्त्व से युक्त था। अपनी आक्रामण शक्ति को बढाते हुए उसने सन् 1000 में मध्य एशिया के बडे भूभाग तक अपना प्रभाव बढ़ा लिया जिसमें ईरान और साइस्तान भी थे। उसके बाद वह भारत आया और उसने भारतवासियों को एक महायुद्ध का पूरा प्रभाव दिखाया जिसका ज्ञान वे हूणों के आक्रमणों के बाद भूल चुके थे। सबसे पहले महमूद ने पंजाब पर बलपूर्वक अधिकार किया जिससे मध्य एशिया के भूखे स्टेप्पेस लोगों के लिए धनाढ्य तथा उपजाऊ भारत भूमि को लूटने का मार्ग प्रशस्त हो गया। कुछ ही वर्षों में थानेश्वर, मथुरा, कन्नोज तथा प्रभास पट्टन जलते हुए खण्ड़हरों में बदल गये। कन्नोज के शासक ने अत्यंत अपमान जनक स्थिति में आत्म समर्पण कर दिया तुर्क लोगों का आक्रमण पूर्वी क्षेत्र में विद्याधर चंदेल द्वारा रोक दिया गया। सोमनाथ मंदिर के विनाश करने के उपरांत महमूद को सिंध के रेगिस्तानी मार्ग से तेजी से वापसी करनी पड़ी क्योंकि वह परमदेव की संगठित सेना के आक्रमण के भय से डर गया था। ‘परमदेव’ को मै धार के भोज परमार के रुप में चिन्हित करता हूं (सन् 1000-1055) [इसके संदर्भ हेतु ‘द हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ इंडियन पीपल’ के खण्ड 5 पृष्ठ VII – XII देखें]
To be continued...
The present series is a Hindi translation of Śatāvadhānī Dr. R. Ganesh's 2023 book Kṣāttra: The Tradition of Valour in India (originally published in Kannada as Bharatiya Kshatra Parampare in 2016). Edited by Raghavendra G S.