Author:shashikiran

ರಸಾನುಭವದ ಅಲೌಕಿಕತೆ ಮತ್ತು ಅಧ್ಯಾತ್ಮನಿಷ್ಠೆಗಳನ್ನು ಎತ್ತಿಹಿಡಿದ ಆಲಂಕಾರಿಕರಲ್ಲಿ ಭಟ್ಟತೌತನು ಅಗ್ರಗಣ್ಯ. ಅವನದೆಂದು ಭಾವಿಸಲಾದ ಎರಡು ಶ್ಲೋಕಗಳಲ್ಲಿ ಈ ಭಾವ ಸೊಗಸಾಗಿ ಹರಳುಗಟ್ಟಿದೆ:

ಪಾಠ್ಯಾದಥ ಧ್ರುವಾಗಾನಾತ್ತತಃ ಸಂಪೂರಿತೇ ರಸೇ |

ತದಾಸ್ವಾದಭರೈಕಾಗ್ರೋ ಹೃಷ್ಯತ್ಯಂತರ್ಮುಖಃ ಕ್ಷಣಮ್ ||

ತತೋ ನಿರ್ವಿಷಯಸ್ಯಾಸ್ಯ ಸ್ವರೂಪಾವಸ್ಥಿತೌ ನಿಜಃ |

ವ್ಯಜ್ಯತೇ ಹ್ಲಾದನಿಷ್ಯಂದೋ ಯೇನ ತೃಪ್ಯಂತಿ ಯೋಗಿನಃ ||[1] (ವ್ಯಕ್ತಿವಿವೇಕ, ಪು. ೯೪)

Ocean

In the Vikramorvaśīyam, the poet has brought in several elements to amplify vipralambha-śṛṅgāra; as mentioned before, Purūrava gets separated thrice from Urvaśī and pines for her company. In no other play do we see the king going mad out of love for his beloved. It is likely that the playwright, Kālidāsa, wanted to provide special scope for elaborate music and enactment in his play and thus designed it to contain many such deeply emotional segments. It is not easy to enact love-madness.

आज हमें पाल राजवंश द्वारा निर्मित कोई भी बडा पूजा केन्द्र अथवा देवालय दिखाई नहीं देता इसका एकमात्र कारण बख्तियार खिलजी तथा उसी के समान अन्य मुस्लिम आक्रांताओं के द्वारा किये गये रक्तरंजित द्वेषयुक्त विनाश लीला में निहित है जिसमें हजारों हिंदू मंदिरों को सतत रूप से नष्ट किया था। पालों से संबंधित आज हमें जो भी उपलब्ध है वे वास्तुशिल्प का कुछ भग्नावशेष है, कुछ तस्वीरें तथा आरेखन है जो विभिन्न म्यूसियमों में संरक्षित किये गये है – उदाहरणार्थ गरुड़ पर आसीन विष्णु की मूर्ति, अर्धनारीश्वर, कल्याणसुन्दर, तथा गंगा – यमुना का शिल्पाकार । यह सभी सनातन धर्म के प्रतीक चिन्ह

Urvashi-Pururavas

There is quite a lot of difference between the story narrated above and the version that occurs in the Kathāsaritsāgara[1]. According to the Kathāsaritsāgara, Purūrava once spots Urvaśī in the Nandana-vana and falls in love with her. Bhagavān Viṣṇu, who understands Purūrava’s heart, instructs Indra to send Urvaśī to him. Purūrava brings her to his hometown and spends many days in conjugal bliss.

अरब के यात्री सुलेमान अत्ताज़िर और अल मसूदी ने भोज की सेना की सदा युद्ध के लिए तैयार रहने वाले गुणों की तथा उसके राज्य की समृद्धि और बाहुल्य की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है। उन्होंने इस बात पर दुःख भी व्यक्त किया है कि वह इस्लाम का अजेय शत्रु है। भोज का पुत्र महेन्द्रपाल उसका सुयोग्य उत्तराधिकारी था और उसने साम्राज्य का और भी विस्तार किया था। उसने प्रसिद्ध विद्वान, कवि तथा गुणी राजशेखर को प्रश्रय दिया था। उसके शासन काल में कला, साहित्य, शिल्प, मूर्तिकला, नृत्य, संगीत तथा शास्त्र परम्परा में अभूतपूर्व प्रगति के साथ साथ व्यापार व्यवसाय में भी अत्यधिक प्रगति हुई थी।

Gokhale Institute of Public Affairs, an organization DVG built and nurtured, has made quiet but sustained efforts to educate people in all matters of collective living. Apart from conducting civic surveys, preparing reports for the perusal of Government and organizing lectures, it has played an active part in times of crisis. For instance, during the Indo-China war, it exhorted all its members and the people at large to contribute to the national defence fund. It issued the following Statement of Appeal on 29 October 1962:

Once, when the precious gem was being brought upon a golden plate, an eagle mistook it for a piece of flesh and flew away with it. The king chased behind the bird and even before he could shoot an arrow at it, it went beyond the bow’s rage. Even as everyone had lost hopes of retrieving the gem, a huntress comes there the gem and also the arrow which had killed the bird. The king is surprised upon seeing the inscription on the arrow – Āyu, the son of Urvaśī and Purūrava.

Himalaya

योद्धा राजवंशों का साहसिक प्रतिरोधक युग

यदि कोई साम्राज्य 220-250 वर्षों तक बना रह सकता है तो उसे एक सफल साम्राज्य कहा जा सकता है। आज के भारत के चार प्रदेशों के औसत क्षेत्रफल वाले विस्तार के भौगोलिक क्षेत्र में फैले सुरक्षित तथा सक्रिय शासन को एक शक्तिशाली साम्राज्य माना जा सकता है। इस पैमाने के अनुसार भारत के कुछ ही राजवंशों को श्रेष्ठता प्रदान की जा सकती है। इनमें मौर्य, गुप्त, चालुक्य, राष्ट्रकूट, प्रतिहार तथा विजयनगर के राजवंश सम्मिलित है।

Urvashi-Pururavas

The Vikramorvaśīyam, like the Mālavikāgnimitram consists of five acts. The following the summary of its plot